इन दिनों फिल्म रेडी का एक गाना कैरेक्टर ढीला काफी प्रचलन में है. इसे पसंद भी किया जा रहा है. हालाँकि मुझे इस गाने में प्रयुक्त शब्द रासलीला पर आपत्ति है. रासलीला शब्द भगवान् श्री कृष्ण से जुदा है, जिसका अर्थ ऐसी लीला या क्रीडा से है, जिससे रस की अनुभूति हो. इनमे कही भी स्वार्थ या अपवित्रता का कोई स्थान नहीं था. शैलेन्द्र सिंह कुशवाह रासलीला के बारे में लिखते हैं, प्राचीन भारतीय संस्कृति में प्रेम की उदात्त अभिव्यक्ति होती थी। कृष्ण की रासलीला इसका प्रतीक है। भक्तिकाव्य में रासलीला शब्द का खूब प्रयोग हुआ है। दरअसल रास एक कलाविधा है। प्रेम और आनंद की उत्कट अभिव्यक्ति के लिए कृष्ण की उदात्त प्रेमलीलाओं का भावाभिनय ही रासलीला कहलाता है। मूलतः यह एक नृत्य है जिसमें कृष्ण को केंद्र में रख गोपियां उनकी परिधि में मुरली की धुन पर थिरकती हैं। अष्टछाप के भक्तकवियों नें प्रेमाभिव्यक्ति करनेवाले अनेक रासगीतों की रचना की है। रास में आध्यात्मिकता भी है जिसमें गोपियों का कृष्ण के प्रति अनुराग व्यक्त होता है। ऐसे में इस गाने में रासलीला शब्द का प्रयोग काफी भोंडेपन में किया गया है. इस गाने में रासलीला शब्द की पवित्रता पर कुठाराघात किया है. इस गाने पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाना चाहिए.
बुधवार, 27 अप्रैल 2011
शनिवार, 29 जनवरी 2011
दहेज क्यों जरूरी
बचपन से ही दहेज प्रथा को कुरीति बताकर इसे समाज से दूर करने की बात सुनता आया। कई मौकों पर बड़े-बुजुर्गों ने दहेज प्रथा के विरोध में लंबा-चौड़ा भाषण देकर युवाओं को दहेज नहीं लेने के प्रति प्रेरित किया। उस वक्त मैं भी सोचने को मजबूर हो जाता था कि क्या दहेज प्रथा सचमुच इतनी बुरी प्रथा है। आए दिन समाचार पत्रों और टेलिवजन चैनलों पर दहेज हत्या की खबरें इस प्रथा के प्रति नफरत का भाव पैदा करने के लिए काफी था।
मैं जैसे-जैसे बड़ा होने लगा और मेरे अंदर भी सोचने-समझने और निर्णय लेने की झमता का विकास होने लगा, तो मैंने दहेज प्रथा को लेकर काफी मंथन किया और निम्नलिखित नतीजे पर पहुंचा।
१. दहेज लड़कियों का अधिकारः
सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय के अनुसार पिता की संपत्ति पर पुत्रों के साथ पुत्रियों का भी बराबर का अधिकार है। हालांकि प्रायोगिक तौर पर देखा जाय तो सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय का पालन करने वाले बहुत कम लोग मिलेंगे। यदि इस निर्णय को माना जाय तो लड़कियों को अपने पिता से उसकी संपत्ति से धन प्राप्त करने का पूरा अधिकार बनता है। शादी के बाद चूंकि लोकलाज और अन्य कारणों से लड़कियां अपने पिता से उसकी संपत्ति में हिस्सा नहीं मांग सकती, इसलिए उसे विवाह के वक्त अपने पिता से दहेज के रूप में धन की मांग करना लड़कियों का अधिकार है।
२. रिश्तों में कायम रहेगी मधुरताः
मान लीजिए कि किसी व्यक्ति की दो पुत्रियां हैं। पहली पुत्री की शादी के समय वर पक्ष किसी प्रकार की दहेज की मांग नहीं करता। वह व्यक्ति विवाह के वक्त अपनी पुत्री को आवश्यक सभी वस्तुएं एवं नाना प्रकार के उपहार देकर विदा करता है, लेकिन दहेज के नाम पर कुछ भी नहीं देता। कुछ दिनों बाद वह अपनी दूसरी पुत्री की शादी करता है। उस दौरान वर पक्ष द्वारा दहेज की मांग की जाती है और लड़की का पिता अपनी पुत्री को खूब सारा दहेज देकर विदा करता है। यह बात बड़ी पुत्री को नागवार गुजरती है और उसका अपने पिता और छोटी बहन से मनमुटाव हो जाता है। वह यदा-कदा उलाहना देने से कभी नहीं चूकती कि आपने मुझे दिया ही क्या है। इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि यदि संबंधों में मधुरता कायम रखनी है तो व्यक्ति अपनी सभी पुत्रियों को बराबर दहेज दे।
३. भविष्य रहेगा सुरक्षितः
भविष्य को किसी ने नहीं देखा। आज की भागदौड़ वाली जिंदगी में कब क्या हो जाए, कहा नहीं जा सकता। ऐसे में धन की आवश्यकता पग-पग पर पड़ती है। रही बात नौकरी की, तो अनिश्चितताओं के इस दौर में कोई नहीं जानता कि किसी व्यक्ति की नौकरी कितनी सुरक्षित है। ऐसे में हर व्यक्ति की चाह होती है कि भविष्य के लिए कुछ पूंजी बनाकर रख ली जाए। एक महत्वपूर्ण बात और है कि यदि किसी महिला का पति किसी दुर्घटना का शिकार होकर जिंदगी खो बैठता है, तो क्या समाज उस महिला का भरण-पोषण करेगा। थोड़े समय के लिए मदद को सैकड़ों हाथ भले ही उठ जाएं, लेकिन यदि ज्यादा समय को ध्यान में रखकर सोचा जाए, तो उस महिला का भविष्य असुरक्षित ही दिखेगा। ऐसे में यदि उस महिला के पास कोई हुनर है तो वह स्वरोजगार से आत्मनिर्भर हो सकती है। स्वरोजगार के लिए भी धन की आवश्यकता होती है और इसमें दहेज में मिले पैसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं। एक अन्य बात यह हो सकती है कि किसी दुर्घटना में पति विकलांग हो जाता है और कहीं आने-जाने के काबिल नहीं रह जाता है। ऐसे में भी दहेज का पैसा अपना व्यवसाय शुरू करने में मदद कर सकता है। इसी प्रकार अन्य गंभीर समस्याएं आने पर भी दहेज में मिला धन काफी मददगार साबित हो सकता है।
मैं जैसे-जैसे बड़ा होने लगा और मेरे अंदर भी सोचने-समझने और निर्णय लेने की झमता का विकास होने लगा, तो मैंने दहेज प्रथा को लेकर काफी मंथन किया और निम्नलिखित नतीजे पर पहुंचा।
१. दहेज लड़कियों का अधिकारः
सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय के अनुसार पिता की संपत्ति पर पुत्रों के साथ पुत्रियों का भी बराबर का अधिकार है। हालांकि प्रायोगिक तौर पर देखा जाय तो सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय का पालन करने वाले बहुत कम लोग मिलेंगे। यदि इस निर्णय को माना जाय तो लड़कियों को अपने पिता से उसकी संपत्ति से धन प्राप्त करने का पूरा अधिकार बनता है। शादी के बाद चूंकि लोकलाज और अन्य कारणों से लड़कियां अपने पिता से उसकी संपत्ति में हिस्सा नहीं मांग सकती, इसलिए उसे विवाह के वक्त अपने पिता से दहेज के रूप में धन की मांग करना लड़कियों का अधिकार है।
२. रिश्तों में कायम रहेगी मधुरताः
मान लीजिए कि किसी व्यक्ति की दो पुत्रियां हैं। पहली पुत्री की शादी के समय वर पक्ष किसी प्रकार की दहेज की मांग नहीं करता। वह व्यक्ति विवाह के वक्त अपनी पुत्री को आवश्यक सभी वस्तुएं एवं नाना प्रकार के उपहार देकर विदा करता है, लेकिन दहेज के नाम पर कुछ भी नहीं देता। कुछ दिनों बाद वह अपनी दूसरी पुत्री की शादी करता है। उस दौरान वर पक्ष द्वारा दहेज की मांग की जाती है और लड़की का पिता अपनी पुत्री को खूब सारा दहेज देकर विदा करता है। यह बात बड़ी पुत्री को नागवार गुजरती है और उसका अपने पिता और छोटी बहन से मनमुटाव हो जाता है। वह यदा-कदा उलाहना देने से कभी नहीं चूकती कि आपने मुझे दिया ही क्या है। इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि यदि संबंधों में मधुरता कायम रखनी है तो व्यक्ति अपनी सभी पुत्रियों को बराबर दहेज दे।
३. भविष्य रहेगा सुरक्षितः
भविष्य को किसी ने नहीं देखा। आज की भागदौड़ वाली जिंदगी में कब क्या हो जाए, कहा नहीं जा सकता। ऐसे में धन की आवश्यकता पग-पग पर पड़ती है। रही बात नौकरी की, तो अनिश्चितताओं के इस दौर में कोई नहीं जानता कि किसी व्यक्ति की नौकरी कितनी सुरक्षित है। ऐसे में हर व्यक्ति की चाह होती है कि भविष्य के लिए कुछ पूंजी बनाकर रख ली जाए। एक महत्वपूर्ण बात और है कि यदि किसी महिला का पति किसी दुर्घटना का शिकार होकर जिंदगी खो बैठता है, तो क्या समाज उस महिला का भरण-पोषण करेगा। थोड़े समय के लिए मदद को सैकड़ों हाथ भले ही उठ जाएं, लेकिन यदि ज्यादा समय को ध्यान में रखकर सोचा जाए, तो उस महिला का भविष्य असुरक्षित ही दिखेगा। ऐसे में यदि उस महिला के पास कोई हुनर है तो वह स्वरोजगार से आत्मनिर्भर हो सकती है। स्वरोजगार के लिए भी धन की आवश्यकता होती है और इसमें दहेज में मिले पैसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं। एक अन्य बात यह हो सकती है कि किसी दुर्घटना में पति विकलांग हो जाता है और कहीं आने-जाने के काबिल नहीं रह जाता है। ऐसे में भी दहेज का पैसा अपना व्यवसाय शुरू करने में मदद कर सकता है। इसी प्रकार अन्य गंभीर समस्याएं आने पर भी दहेज में मिला धन काफी मददगार साबित हो सकता है।
रविवार, 16 जनवरी 2011
बैलों की चिंता
कल जब मैं एक तबेले के निकट से गुजर रहा था, तो दो बैलों को आपस में बातें करते सुना। दोनों चिंतित दिख रहे थे और काफी गंभीर मुद्दे पर बात कर रहे थे। पहला बैल बोला- यार सरकार ने एक बार फिर पेट्रोल की कीमतें बढ़ा दी हैं। दूसरे बैल ने कहा- तो इसमें तुम्हें चिंतित होने की क्या जरूरत है, जो लोग पेट्रोल का इस्तेमाल करते हैं उन्हें इसके बारे में सोचने दो। तब पहले बैल ने कहा- अब मैं क्या बताऊं? पेट्रोल का मूल्य बढऩे का असर सीधे-सीधे हमलोगों के स्वास्थ पर पडऩे वाला है।
दूसरा- वो कैसे?
पहला- अरे यार, अब लोग कार-मोटरसाइकिल तो चला नहीं पाएंगे। तो उन्हें वापस अपनी बैलगाड़ी निकालनी पड़ेगी। और बैलगाड़ी में जोतेंगे तो हमें ही।
दूसरा- भाई, ठीक कहा तुमने। ये तो सचमुच काफी गंभीर विषय है। अच्छा, अब हमें क्या करना चाहिए।
पहला- कुछ नहीं, भगवान से प्रार्थना करो कि सरकार को सुबुद्धि आए और वह पेट्रो पदार्थों की कीमतें नियंत्रित करें। तभी महंगाई पर भी रोक लगेगी और हमें भी राहत मिल जाएगी।
दूसरा- वो कैसे?
पहला- अरे यार, अब लोग कार-मोटरसाइकिल तो चला नहीं पाएंगे। तो उन्हें वापस अपनी बैलगाड़ी निकालनी पड़ेगी। और बैलगाड़ी में जोतेंगे तो हमें ही।
दूसरा- भाई, ठीक कहा तुमने। ये तो सचमुच काफी गंभीर विषय है। अच्छा, अब हमें क्या करना चाहिए।
पहला- कुछ नहीं, भगवान से प्रार्थना करो कि सरकार को सुबुद्धि आए और वह पेट्रो पदार्थों की कीमतें नियंत्रित करें। तभी महंगाई पर भी रोक लगेगी और हमें भी राहत मिल जाएगी।
शुक्रवार, 17 सितंबर 2010
रेलवे के अधिकारी समझे अपनी जिम्मेदारी
एक बार मैं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विद्यापीठ में एमफिल में एडमिशन लेने के लिए प्रवेश परीक्षा देने वर्धा (महाराष्ट्र) गया था। लौटते समय सेवाग्राम स्टेशन से हमें ट्रेन पकडऩी थी। हम कुल पांच लोग थे। स्टेशन पर आने के बाद हमें पता चला कि ट्रेन तीन घंटे लेट है। मैं टिकट काउंटर पर गया और भोपाल के लिए पांच टिकट बुकिंग क्लर्क से मांगे। मैंने उससे साफ-साफ कहा कि भोपाल के लिए केरल एक्सप्रेस के पांच टिकट दीजिए। बुकिंग क्लर्क ने बिना कोई आपत्ति जताए टिकट मेरी ओर बढ़ा दिए।
टिकट लेने के बाद हमलोग प्लेटफार्म पर आ गए। वहां गर्मागर्म दाल की पकौडिय़ां बनते देख मेरे मुंह में पानी आ गया। मैंने पांच प्लेट आर्डर कर दिए। सचमुच वह पकौडिय़ां काफी लजीज थीं। परीक्षा के बारे में गुफ्तगू करते हुए कब तीन घंटे बीत गए, पता ही नहीं चला। तभी उद्घोषणा हुई कि केरल एक्सप्रेस प्लेटफार्म संख्या दो पर आ रही है। हमलोग उस वक्त उसी प्लेटफार्म पर थे, इसलिए कोई भाग-दौड़ नहीं करनी पड़ी। बहरहाल, ट्रेन आई और हमलोग उसपर सवार हो गए। रातभर हमने ट्रेन में खूब मस्ती की। सुबह करीब साढ़े तीन बजे ट्रेन भोपाल स्टेशन पर पहुंची। जब हमलोग स्टेशन से बाहर निकल रहे थे, तो वहां पहले से मौजूद टिकट कलेक्टरों की टीम में से एक ने मेरे एक साथी से टिकट मांगा। मैं आगे निकल चुका था, इसलिए मेरे साथी ने मुझे आवाज दी। मैं वहां पहुंचा और मैंने टिकट कलेक्टर को टिकट दिखाई। टिकट देखने के बाद उसने मुझसे प्रतिव्यक्ति २५६ रुपये जुर्माना मांगा। मैंने जब कारण पूछा, तो उसने कहा कि इस ट्रेन में ६०० किलोमीटर से कम की यात्रा प्रतिबंधित है। मैंने जब उससे कहा कि बुकिंग क्लर्क से ट्रेन का नाम बताकर मैंने टिकट लिया है, फिर भी वह मानने को तैयार नहीं हुआ। मैं उससे उलझने के मूड में था, लेकिन मेरे साथियों में से एक का उसी दिन १० बजे से एक अन्य परीक्षा होने के कारण मैं मजबूर हो गया। हमने जुर्माने की राशि भरी और स्टेशन के बाहर आए।
मेरा यह संस्मरण लिखने का एकमात्र उद्देश्य रेलवे की लापरवाही उजागर करना है। मेरे जैसे प्रतिदिन सैकड़ों लोग रेलवे की लापरवाही का खामियाजा जुर्माना देकर भुगतते हैं। किस ट्रेन से सफर करने के लिए दूरी प्रतिबंध कितने किलोमीटर का है, यह न तो किसी ट्रेन पर अंकित होता है और न ही संबंधित स्टेशनों पर। ऐसे में कोई भी यात्री कैसे जानेगा कि किस ट्रेन से उसे यात्रा करनी है और किससे नहीं। जिस तरह से रेलवे जहरखुरानों से बचने के लिए जागरूक करता है और आग रोकने के लिए ट्रेन सहित स्टेशनों पर जानकारी अंकित करता है, क्या उसी प्रकार ट्रेनों में दूरी प्रतिबंध के प्रति यात्रियों को समुचित जानकारी देना रेलवे की जिम्मेदारी नहीं बनती है?
यह तो हुई ट्रेनों में दूरी प्रतिबंध की। अब यदि ट्रेनों में और स्टेशनों पर अवैध वसूली की बात करें, तो आए दिन अखबरों में इस प्रकार की खबरें पढऩे को मिलती है। कई बार मैंने भी देखा है कि किस प्रकार गरीब और कम पढ़-लिखे लोगों को उल्टा-सीधा नियम बताकर उचित टिकट होने पर अवैध रूप से जुर्माना वसूल लिया जाता है। डर के मारे पीडि़त चुपचाप जुर्माना दे देता है और किसी से कोई शिकायत नहीं करता है। हालांकि कई बार जुर्माने की इस राशि से रेलवे का खजाना भरने की बजाय संबंधित टिकट परीक्षक की जेबें भरती हैं। यह सिलसिला रोज चलता है, लेकिन रेलवे के विजिलेंस अधिकारी न जाने कैसी कुंभकर्णी निद्रा में सोये रहते हैं। रेलवे में भ्रष्टïाचार इस कदर व्याप्त हो गया है कि टिकट बुकिंग से लेकर टिकट चेकिंग कहीं भी रेलयात्री आर्थिक तौर पर सुरक्षित नहीं है। इस समस्या का समाधान तभी निकल सकता है, जब यात्री अपने अधिकारों को समझे और हक के लिए लडऩे से पीछे न हटे। साथ ही विजिलेंस के अधिकारी भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए नियमित औचक छापेमारी की कार्रवाई करते रहे।
टिकट लेने के बाद हमलोग प्लेटफार्म पर आ गए। वहां गर्मागर्म दाल की पकौडिय़ां बनते देख मेरे मुंह में पानी आ गया। मैंने पांच प्लेट आर्डर कर दिए। सचमुच वह पकौडिय़ां काफी लजीज थीं। परीक्षा के बारे में गुफ्तगू करते हुए कब तीन घंटे बीत गए, पता ही नहीं चला। तभी उद्घोषणा हुई कि केरल एक्सप्रेस प्लेटफार्म संख्या दो पर आ रही है। हमलोग उस वक्त उसी प्लेटफार्म पर थे, इसलिए कोई भाग-दौड़ नहीं करनी पड़ी। बहरहाल, ट्रेन आई और हमलोग उसपर सवार हो गए। रातभर हमने ट्रेन में खूब मस्ती की। सुबह करीब साढ़े तीन बजे ट्रेन भोपाल स्टेशन पर पहुंची। जब हमलोग स्टेशन से बाहर निकल रहे थे, तो वहां पहले से मौजूद टिकट कलेक्टरों की टीम में से एक ने मेरे एक साथी से टिकट मांगा। मैं आगे निकल चुका था, इसलिए मेरे साथी ने मुझे आवाज दी। मैं वहां पहुंचा और मैंने टिकट कलेक्टर को टिकट दिखाई। टिकट देखने के बाद उसने मुझसे प्रतिव्यक्ति २५६ रुपये जुर्माना मांगा। मैंने जब कारण पूछा, तो उसने कहा कि इस ट्रेन में ६०० किलोमीटर से कम की यात्रा प्रतिबंधित है। मैंने जब उससे कहा कि बुकिंग क्लर्क से ट्रेन का नाम बताकर मैंने टिकट लिया है, फिर भी वह मानने को तैयार नहीं हुआ। मैं उससे उलझने के मूड में था, लेकिन मेरे साथियों में से एक का उसी दिन १० बजे से एक अन्य परीक्षा होने के कारण मैं मजबूर हो गया। हमने जुर्माने की राशि भरी और स्टेशन के बाहर आए।
मेरा यह संस्मरण लिखने का एकमात्र उद्देश्य रेलवे की लापरवाही उजागर करना है। मेरे जैसे प्रतिदिन सैकड़ों लोग रेलवे की लापरवाही का खामियाजा जुर्माना देकर भुगतते हैं। किस ट्रेन से सफर करने के लिए दूरी प्रतिबंध कितने किलोमीटर का है, यह न तो किसी ट्रेन पर अंकित होता है और न ही संबंधित स्टेशनों पर। ऐसे में कोई भी यात्री कैसे जानेगा कि किस ट्रेन से उसे यात्रा करनी है और किससे नहीं। जिस तरह से रेलवे जहरखुरानों से बचने के लिए जागरूक करता है और आग रोकने के लिए ट्रेन सहित स्टेशनों पर जानकारी अंकित करता है, क्या उसी प्रकार ट्रेनों में दूरी प्रतिबंध के प्रति यात्रियों को समुचित जानकारी देना रेलवे की जिम्मेदारी नहीं बनती है?
यह तो हुई ट्रेनों में दूरी प्रतिबंध की। अब यदि ट्रेनों में और स्टेशनों पर अवैध वसूली की बात करें, तो आए दिन अखबरों में इस प्रकार की खबरें पढऩे को मिलती है। कई बार मैंने भी देखा है कि किस प्रकार गरीब और कम पढ़-लिखे लोगों को उल्टा-सीधा नियम बताकर उचित टिकट होने पर अवैध रूप से जुर्माना वसूल लिया जाता है। डर के मारे पीडि़त चुपचाप जुर्माना दे देता है और किसी से कोई शिकायत नहीं करता है। हालांकि कई बार जुर्माने की इस राशि से रेलवे का खजाना भरने की बजाय संबंधित टिकट परीक्षक की जेबें भरती हैं। यह सिलसिला रोज चलता है, लेकिन रेलवे के विजिलेंस अधिकारी न जाने कैसी कुंभकर्णी निद्रा में सोये रहते हैं। रेलवे में भ्रष्टïाचार इस कदर व्याप्त हो गया है कि टिकट बुकिंग से लेकर टिकट चेकिंग कहीं भी रेलयात्री आर्थिक तौर पर सुरक्षित नहीं है। इस समस्या का समाधान तभी निकल सकता है, जब यात्री अपने अधिकारों को समझे और हक के लिए लडऩे से पीछे न हटे। साथ ही विजिलेंस के अधिकारी भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए नियमित औचक छापेमारी की कार्रवाई करते रहे।
सोमवार, 13 सितंबर 2010
धूमिल हो रहा हिंदी का अस्तित्व
एक दिन मैं पिज्जा हट में अपने मित्रों के साथ दावत मनाने पहुंचा। वहां सभी लोग अंग्रेजी बोल रहे थे और अंग्रेजी शैली में पिज्जा खा रहे थे। मेरे एक मित्र ने वेटर से अंग्रेजी भाषा में ही पानी मांगा- एक्सक्यूज मी, कुड यू प्लीज गिव मी ए ग्लास ऑफ वाटर? उसने वेटर से तीन बार पानी मांगा, लेकिन वेटर ने कोई ध्यान नहीं दिया। उस रेस्त्रां में बैठे अन्य लोगों को भी कोई असहजता महसूस नहीं हुई, क्योंकि वे सभी भी कथित तौर पर प्रगतिशील समाज अर्थात प्रोग्रेसिव सोसाइटी के लोग थे। जब मैंने वेटर से हिंदी भाषा में पानी के लिए अनुरोध किया- महोदय, क्या मुझे एक गिलास पेयजल मिलेगा? तो सबकी नजरें मुझे घूरने लगीं। मुझे थोड़ी देर के लिए अजीब लगा, लेकिन जल्द ही मैं सहज हो गया। हालांकि तभी वेटर छह गिलास पानी लेकर हमारी मेज पर आया और मेरे सभी मित्रों को पानी दिया। मुझे फख्र इस बात का था कि मेरे हिंदी भाषा में पानी मांगने पर वेटर ने तुरंत पानी लाकर दे दिया और निराशा इस बात की कि अपने ही देश में हिंदी में बात करने वालों को समाज का एक बड़ा तबका देहाती और पिछड़ा समझता है।
एक अन्य वाकया तब मेरे सामने आया जब मैं बैंक में हिंदी में मांगपत्र (डिमांड ड्राफ्ट) बनवाने गया। वहां बैंक की दीवारों पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था कि यहां हिंदी में काम करने में गौरव की अनुभूति की जाती है। कृपया आवेदन पत्र भरने के लिए हिंदी भाषा का प्रयोग करें, जिससे राष्टï्र भाषा की प्रगति में हम भी भागीदार बन सकें। मांगपत्र का आवेदन प्रपत्र हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में छपा था। मैंने भी उत्साहपूर्वक हिंदी में आवेदन प्रपत्र भरकर जमा खिड़की पर पैसे सहित हाथ बढ़ा दिया। इस पर पैसे जमा लेने वाले लिपिक ने कहा कि फार्म अंग्रेजी में भरकर लाइए। जब मैंने उससे कहा कि मुझे जहां आवेदन करना है उसमें भुगतान पाने वाले पक्ष का नाम हिंदी में ही लिखा है तो मैं उसे अंग्रेजी में कैसे भरूं? तो उसने कहा कि इसमें मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता। मैं सीधा शाखा प्रबंधक के पास पहुंचा और शिकायत की तो उसने भी हाथ खड़े कर दिए। मुझे घोर निराशा हुई कि आज जब तकनीक की दुनिया में उत्तरोत्तर प्रगति हो रही है और इंटरनेट पर सर्च इंजन तक हिंदी में आ गया है। फिर भी बैंकों में हिंदी भाषा की उपेक्षा क्यों की जा रही है।
ऐसे ही अनेक वाकयों से आएदिन सामना होता है, जब अंग्रेजी के आगे हिंदी को सर झुकाना पड़ता है। जब हिंदी अपमानित होती है और अंग्रेजियत का सम्मान किया जाता है। जब हिंदी भाषियों को पिछड़ा और अंग्रजी बोलने वाले को प्रगतिशील का दर्जा दिया जाता है। ऐसा सिर्फ हिंदुस्तान में ही हो सकता है, क्योंकि यहां के लोग हिंदी को घर की मुर्गी दाल बराबर की कहावत का अक्षरश: पालन करते हैं। पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण के चक्कर में हिंदी भाषा का अस्तित्व धूमिल होता जा रहा है। हिंदी की यह दुर्दशा देखकर काफी निराशा होती है।
एक अन्य वाकया तब मेरे सामने आया जब मैं बैंक में हिंदी में मांगपत्र (डिमांड ड्राफ्ट) बनवाने गया। वहां बैंक की दीवारों पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था कि यहां हिंदी में काम करने में गौरव की अनुभूति की जाती है। कृपया आवेदन पत्र भरने के लिए हिंदी भाषा का प्रयोग करें, जिससे राष्टï्र भाषा की प्रगति में हम भी भागीदार बन सकें। मांगपत्र का आवेदन प्रपत्र हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में छपा था। मैंने भी उत्साहपूर्वक हिंदी में आवेदन प्रपत्र भरकर जमा खिड़की पर पैसे सहित हाथ बढ़ा दिया। इस पर पैसे जमा लेने वाले लिपिक ने कहा कि फार्म अंग्रेजी में भरकर लाइए। जब मैंने उससे कहा कि मुझे जहां आवेदन करना है उसमें भुगतान पाने वाले पक्ष का नाम हिंदी में ही लिखा है तो मैं उसे अंग्रेजी में कैसे भरूं? तो उसने कहा कि इसमें मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता। मैं सीधा शाखा प्रबंधक के पास पहुंचा और शिकायत की तो उसने भी हाथ खड़े कर दिए। मुझे घोर निराशा हुई कि आज जब तकनीक की दुनिया में उत्तरोत्तर प्रगति हो रही है और इंटरनेट पर सर्च इंजन तक हिंदी में आ गया है। फिर भी बैंकों में हिंदी भाषा की उपेक्षा क्यों की जा रही है।
ऐसे ही अनेक वाकयों से आएदिन सामना होता है, जब अंग्रेजी के आगे हिंदी को सर झुकाना पड़ता है। जब हिंदी अपमानित होती है और अंग्रेजियत का सम्मान किया जाता है। जब हिंदी भाषियों को पिछड़ा और अंग्रजी बोलने वाले को प्रगतिशील का दर्जा दिया जाता है। ऐसा सिर्फ हिंदुस्तान में ही हो सकता है, क्योंकि यहां के लोग हिंदी को घर की मुर्गी दाल बराबर की कहावत का अक्षरश: पालन करते हैं। पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण के चक्कर में हिंदी भाषा का अस्तित्व धूमिल होता जा रहा है। हिंदी की यह दुर्दशा देखकर काफी निराशा होती है।
शनिवार, 24 जुलाई 2010
I'm back
After a long interval, i'm back on chughli. It was very painful to me to get away from the world of internet since eight months. And i m feeling so happy today. In last eight months i faced a lot of difficulties. I resigned from patrika due to extreme tension and was very depressed at that time. But it is said that time fill all the wounds in life of a person. It happened. Some fabulous moments also came in my life in these days. My elder brother get married and i got a new job. Now i m very happy.
सोमवार, 31 अगस्त 2009
मीडिया में हो रहे शोषण के खिलाफ एक नया ब्लॉग

आज जब मैं ब्लॉग सर्च कर रहा था, तो अचानक एक ब्लॉग पर नज़र पड़ी। नाम था http://www.daityaguru.blogspot.com/ . देखकर उत्सुकता हुई की आख़िर इस ब्लॉग में क्या है? सो मैंने इसपर क्लिक किया। उसके बाद मुझे जो दिखा वो मैं इस पोस्ट के साथ अटैच कर रहा हूँ।
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